Na Mano To Patthar, Mano To Bhagwan


हर पत्थर यूँही भगवान नहीं बनता यारों 
आख़िर कोई तो है जो पत्थरों की भी तक़दीर लिखता है
 

हम में से बहुतों ने धन्नना जाट की कहानी तो सुनी ही होगी जिसके विश्वास ने पत्थर को भी भगवान बना दिया था  । पर आज मैं आपको आज के युग की. इसी समय की एक ऐसी कहानी बताऊँगा जहां शायद भगवान स्वयं ही आ गए थे, अपने भक्त की रक्षा करने और इस कहानी के प्रत्यक्षदर्शी आज भी मोजूद है, यही हमारे बीच
 ये कोई दुर्लभ कहानी भी नहीं है, ऐसी घटना हम में से बहोतों के साथ घटी भी हो सकती है । बस आवश्यकता है तो विश्वास की, श्रद्धा की और भगवान के प्रति अटूट प्रेम की 

कहीं किसी छोटे से नगर में एक 8 साल का नन्हा वैभव अपने परिवार के साथ रहता था । उनके पिता बचपन से ही उन्हें अनेक  प्रकार के क़िस्से कहानियाँ सुनाते। हर संध्या वो सब भजन गाते वैभव भी बड़े चाव से उन कहानियों को सुनता और उनके पात्रों में स्वयं को खोजता । समय के साथ वैभव में भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास बड़ता गया । जहां बाक़ी बच्चे बाहर खेल कूद में लगे होते वहीं वैभव अपने घर के मंदिर में रखी भगवान की मूरत को एकटक देखता रेहता और घंटों घंटों ध्यान मगन हो जाता । इस उम्र में शुद्ध हृदय जो था ।
(यहीं इसी उम्र में हमें अपने बच्चों को ध्यान की दीक्षा देनी चाहिए ताकि सामाजिक छल कपट के कुचक्र में पड़ने से पहले ही वे अपनी ऊर्जा को केंद्रित करना सीख सके)

ख़ैर समय बीतता गया । उस साल की शरद ऋतु में उनके यहाँ वैभव के ममेरे भाई ( सुरेंद्र) के विवाह का न्योता आया । सारा परिवार ख़ुशी ख़ुशी शादी की तैयारियों में लग गया । खूब ख़रीदारी हुई । वैभव के लिए भी उसके पिता ने एक सुंदर रेलगाड़ी के चित्र वाली जरसी ख़रीदी । वैभव को वो जरसी बड़ी पसंद आयी । विवाह का दिन आया । बारात पास के शहर जानी थी । बारात  के भोजन का प्रबन्ध बड़ी ही सुंदर धर्मशाला में किया गया था । (जी हाँ, ये वो समय था जब बारात धर्मशाला या मंदिर और चौपालों में रुकती थी )। वैभव ने बढ़िया बढ़िया मिठाइयाँ पकवान जी भर के खाए । अब बारात को बैंड बाजे के साथ वधू के घर तक जाना था । वधू पक्ष का घर धर्मशाला से कोई 4-5 किलोमीटरदूर था । बारात के चलने में कोई एक घंटे का वक़्त था तो सभी बच्चे धर्मशाला के पीछे बने पार्क में जा कर खेलने लगे ।

निश्चित समय पर बारात पूरे ग़ाज़े बाजे के साथ अपने गंतव्य की और चल पड़ी । सब नाच रहे थे । हर कोई अपनी मस्ती में झूमता नाचता आगे बड़ रहा था । बारात वधू पक्ष के घर जा पहुँची । तभी वैभव को ध्यान आया के वो अपनी पसंदीदा जरसी तो वहीधर्मशाला में ही भूल गया था । वैभव को तो वो जरसी बहुत पसंद थी सो उसने अपने भाई को वो जरसी लाने के लिए कहा । उसके भैया ने उसे थोड़ी देर में चलने के लिए कहाँ । पर वैभव को तो अपनी जरसी अभी चाहिए थी । आख़िर 7-8 साल का बच्चा और उसकी नई नई जरसी – तो वो भला कहाँ इंतज़ार कर सकता था । वैभव ने अपने पिता जी को ढूँढा पर वो भी उसे कहीं दिखाई नहीं दिए ।तो वैभव महाराज खुद अकेले ही अपनी जरसी को लेने निकल पड़े ।

8 साल का बच्चा – नया शहर – ना जाने कितने मोड़ – बाज़ार के गलियारे । पर वैभव अपने भगवान का नाम ले कर निकल पड़ा । अब चूँकि वह काफ़ी समय से ध्यान व समाधि का अभ्यास कर रहा था तो इसीलिए उसे काफ़ी सारे मोड़ व रास्ते भी याद आते गए । पर आख़िर कब तक, था तो 8 साल का नन्हा बच्चा ही । मुख्य बाज़ार के चोराहे पर आकर वो रास्ता भूल ही गया और चल पड़ा एकदम विपरीत दिशा में । पर तभी पीछे से उसे किसी ने आवाज़ लगाईं – वैभव! वैभव ने पीछे मुड़ कर देखा तो उसके बड़े भैया और उनका ममेरा भाई उसके पीछे पीछे ही आ रहे थे । वैभव ने भाग कर उनकी उँगली पकड़ ली और दोनो भाई पहुँच गए धर्मशाला में । धर्मशाला में पहुँचते ही वैभव भाग कर एक कमरे में गया और अपनी रेलगाड़ी वाली जरसी को पा कर बड़ा खुश हुआ । ख़ुशी ख़ुशी बहार आया पर क्या देखता है के वहाँ तो कोई नहीं था । ना भैया ना मामा का लड़का । वैभव ने आवाज़ दी, “भैया! राम भैया! ” पर वहाँ कोई नहीं था । तो क्या स्वयं भगवान उसे रास्ता बताने आए थे । पता नहीं, पर वैभव को तो शायद यही लगा । आख़िर ये हमारा विश्वास ही है जो पत्थर को भी भगवान बना देता है 

तो वैभव एक बार फिर अपनी जरसी को अपने गले में बांध निकल पड़ा वधू पक्ष के घर की तरफ़ – फिर से अकेला । 8 साल का बच्चा – कहाँ तक रास्ता याद रहता । आख़िर वैभव रास्ता भूल ही गया । अनजान शहर! इतना बड़ा! किसी को जानता नहीं! कोई घर पता ठिकाना याद नहीं! धीरे धीरे शाम भी होने लगी । अंधेरा बड़ने लगा । अब वैभव को ड़र लगने लगा । आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। भैया, माँ, पापा कहते वैभव उन अनजान गलियों में ना जाने कहाँ जा रहा था ।तभी पास खड़े दो लोगों ने ऐसे रोते बच्चे को देखा तो उसे बुलाने लगा पर वैभव ओर ड़र गया । वो भागा – जितनी तेज भाग सकता था –  भागा । भागते भागते थक गया, भूख भी लगने लगी । उसके आँसू ओर तेज बहने लगा ।  काफ़ी दूर भागने के बाद, वैभव ने पीछे मुड़ कर देखा । जब उसे कोई नहीं दिखा तो वैभव को साँस में साँस आयी । पर समस्या अब भी वही थी ।परेशान भूखा प्यासा वैभव एक अनजान शहर में अकेला कहीं खो गया था ।

उसके आँसू रुक ना रहे थे और वो रोते रोते धीरे धीरे चलता रहा । अचानक एक चौक के पास एक मोटर साइकल, वैभव के पास आ कर रुकी । उस पर सवार व्यक्ति ने अपना हेल्मेट उतारा और बड़े प्यार से वैभव को और देख कर पूछा, “ क्या हुआ मेरे बच्चे, तुम्हारे मम्मी पापा कहाँ है “। मम्मी पापा का नाम सुनते ही वैभव और ज़ोर से रोने लगा । तब  वह अनजान व्यक्ति अपनी मोटर साइकल से उतरा और वैभव की और अपनी उँगली बड़ा कर सड़क किनारे बैठ गया ।  वैभव को भी ना जाने क्यों? पर उन्हें देख कर बिलकुल डर नहीं लगा । बल्कि उनका अपनापन देख कर वह उनकी उँगली पकड़ कर उनके पास ही बैठ गया और रोते रोते बोला, “ मुझे मम्मी पापा के पास जाना है । मैं उनके साथ भैया की शादी में आया था पर वो सब लोग कहीं खो गए है”

यह सुन वो अंकल मुस्कुराए और उन्होंने वैभव के आँसू पोंछें और बड़े ही प्यार से बोले, “ मम्मी पापा कहीं खो गए है तो कोई बात नहीं हम उन्हें ढूँढ लेंगे।” वैभव ने उन्हें बताया के वो एक धर्मशाला में रुके हुए थे । अंकल ने कहा के कोई बात नहीं । इस शहर में 6 धर्मशाला हैं, मैं तुम्हें अपनी गाड़ी पर बिठा सभी धर्मशाला दिखाऊँगा । तुम अपनी धर्मशाला पहचान लोगे ना । वैभव ने हाँ में सिर हिला दिया । अब उन अंकल ने नन्हे वैभव को मोटर साइकल पर बिठाया और एक हलवाई को दुकान पर ले गए । अंकल और वैभव ने दूध जलेबी खाई । उसने जलेबी खाते खाते अंकल से पूछा के आपको कैसा पता के मुझे जलेबी बहुत पसंद है । अंकल ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा दिए । वैभव को बहुत भूख लगी ही थी । जलेबी खाने के बाद वैभव भाग कर मोटर साइकल पर बैठ गया । अंकल ने उसकी जरसी गले से खोल कर उसे वैभव को पहना दिया और उसे ले कर चल दिए शहर की धरमशालाओं में उसके मम्मी पापा को ढूँढने ।

एक – दो – तीन – चार – पाँच धर्मशाला देखने के बाद भी जब वैभव ने ना में सिर हिलाया, तो अंकल ने फिर अपनी मीठी मुस्कान के साथ प्यार से वैभव के सिर पर हाथ फेरा और कहा अब तो एक ही धर्मशाला बची है चलो वहाँ चलते है । वो दोनो फिर से मोटर साइकल पर बैठे और चल दिए आख़री धर्मशाला को ओर। अभी वो पाँचवीं धर्मशाला से आगे निकले ही थे के वैभव तुरंत ज़ोर से चिल्लाया, “ अंकल रुको, ये पार्क – हम दिन में इसी पार्क में खेल रहे थे । यही है यही है ।” अंकल ने मोटर साइकल रोकी । वैभव तुरंत मोटर साइकल से कूदा और भागा वापस धर्मशाला को ओर । धर्मशाला के दरवाज़े से ही मम्मी पापा और भैया की आवाज़ लगाता तुरंत अंदर की ओर गया । वहाँ सामने ही उसकी माँ और बहने बैठी हुई थी । सब का रो रो कर बुरा हाल था । वैभव को आवाज़ सुनते ही मानो सबको नयी ज़िंदगी मिल गयी हो ।

माँ ने भाग के वैभव को गले से लगा लिया और गोद में लेकर फिर से रोने लगी । वैभव को भी ख़ुशी का ठिकाना ना हो । इतने में वैभव के पापा और भैया भी आ गए । वैभव के पापा ने पूछा, “ कहाँ चला गया था, कहाँ कहाँ नहीं दूँढा तुझे । कौन लाया तुझे वापस । ये सुनते ही वैभव को मोटर साइकल वाले अंकल का ध्यान आया । वो तुरंत अपने पापा को लेकर वापस दरवाज़े पर गया पर!!!

वहाँ तो कोई नहीं था । ना अंकल, ना मोटर साइकल। सब हैरान थे पर वैभव के चेहरे पर उसकी वही पुरानी मुस्कान लौट आयी । उसके नेत्र अपने आप बंद हो गए और हाथ स्वयं ही नमस्कार की मुद्रा में चले गए । मानो मन ही मन अपने पिता का सिखाया गीत गुनगुना रहा हो

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे
हरे क़ृष्णा हरे क़ृष्णा, क़ृष्णा क़ृष्णा हरे हरे

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