रामचरितमानस में अत्रि मुनि से प्रभु की भेंट अत्यंत ही महत्वपूर्ण प्रसंग है । यहाँ प्रभु आख़री बार किसी संत से ज्ञान चर्चा करते है । मुनीश्वर के माध्यम से प्रभु मनुष्य को आदर्श पति धर्म तथा माता अनुसूया के माध्यम से आदर्श नारी व पतिव्रत धर्म की ज्ञान चर्चा करते है (Click here to learn about PatiVrat Dharma) यदि आज का मनुष्य इस धर्म का लेश मात्र भी अपने जीवन में उतार ले तो समाज की समस्त समस्याओं का अंत हो सकता है, और यदि मनुष्य इसे अपना जीवन मंत्र बना ले तो उसका जीवन इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग तुल्य हो जाएगा ।

प्रभु का आगमन जानकर, ब्रह्मर्षि अत्रि अत्यंत प्रसन्न हुए । फिर भगवान को कंदमूल अर्पित कर अत्रि मुनि अपने दोनों हाथों को ज़ोरकर भगवान राम की स्तुति करते है ।
उसके बाद ब्रह्मर्षि अत्रि, भगवान राम से पुरुष धर्म की कुछ बातों पे चर्चा करते है।
मुनी श्रेष्ठ ने कहा –
हे राम, तुम्हारे द्वारा जग को कुछ संदेश सुनाना है
कर्तव्य पतित नरमण्डल को किंचित उपदेश सुनाना है
यथा नारी की पहचान में विपत्ति काल में होती है तथा पुरुष के धर्म और चरित्र की परीक्षा भी समय आने पर ही होती है
पुरुषों को तीन श्रेणियों में बाटाँ गया है
उत्तम – जो अन्य स्त्रियों को माता, बहन व पुत्री के रूप में देखते है
मध्यम – जो भय व परिस्थिति वश अपनी मर्यादा में रहते है । चंचल मन के होने पर भी परस्थिति के कारण नीके है
नीच – जो हमेशा ही दुर्व्यसनों में लीन रहते है
जब आदि पुरुष ने संसार बसाया, अधिकार सभी का एक सामान बनाया
परंतु
नारी समाज को पुरुष अपनी सम्पति समझते है
है खेद अपने को ऊँचा व नारी को नीचा ही गिनते है
अर्धांगिनी की पदवी देकर झूठा सत्कार कर रहे है
सहधर्मिनी पद के पर्दे में अति अत्याचार कर रहे है
तुम पतिव्रत पतिभक्त बनो यह उन्हें सिखाया जाता है
अपने पर वही बात आती तो भेद छुपाया जाता है
बाहर के नाना दोषों से जीवन कलुषित करने वालों
इस दुनिया के दुर्व्यसनो पर मोहित होकर मरने वालों
सीखों तुम नारिमण्डल से सच्चा निस्वार्थ कर्म है क्या
क्या प्रेम और क्या सहनशक्ति, सेवा है क्या स्वधर्म है क्या
हमारे आदि ग्रन्थों में भी पुरुष व स्त्री के विवाह को एक पवित्र संस्कार माना है । फेरों के वक्त सप्तपदि के नियमों का उल्लेख भी आदर्श विवाह के मूल मंत्र के रूप में किया गया है, जिनका दांपत्य जीवन में काफी महत्व होता है।
आज भी यदि इनके महत्व को समझ लिया जाता है तो वैवाहिक जीवन में आने वाली कई समस्याओं से निजात पाई जा सकती है। समय समय पर उनके स्मरण द्वारा मनुष्य के आचरण का उत्थान संभव है
सप्त्पदी पर पुरुष द्वारा दिए गए वचन कुछ इस प्रकार से है
(Click here to learn about Bride Promises at the time of Wedding)

पहला वचन
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी।
पहला वचन – इसमें कन्या वर से मांगती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
दूसरा वचन
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम ।।
कन्या वर से अपने दूसरे वचन में कहती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
तीसरा वचन
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्या:।
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं।।
तीसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।
चौथा वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं।।
चौथे वचन में कन्या कहती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं।
पांचवां वचन
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या।।
अपने पांचवे वचन में कन्या वर से मांग करती है – अपने घर के कार्यों में, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मंत्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
यह वचन महिला को वास्तव में बराबरी का दर्जा दिलाने और विवाहोपरांत उसके अधिकार को रेखांकित करता है लेकिन ????
छठा वचन
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम ।।
अपने इस वचन में कन्या वर से कहती है – जब मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूं, तब आप वहां सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आपको दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
सातवां वचन
परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या।।
इस अंतिम वचन में कन्या वर से मांगती है – आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

पुरुष प्राकृतिक रूप से अपने आंतरिक आवरण में बहुत ही दुर्बल होता है । इसीलिए अपने बाहरी आवरण में अपनी इसी दुर्बलता को छुपाने के लिए वह स्त्री को अपने से निम्न दिखाने का प्रयास करता है
परंतु पति पत्नी का सम्बंध सदैव आपसी प्रेम, विश्वास और सम्मान पर आधारित होता है यदि प्रेम और सम्मान ना हो, तो दाम्पत्य जीवन में सुख और शांति और आत्मिक आनंद का होना अत्यंत दुर्लभ है
भगवान राम व माता सीता आपके वैवाहिक जीवन में परस्पर प्रेम, विश्वास तथा सम्मान का भाव बनाए रखें
॥ कल्याणम अस्तु ॥
॥ जय श्री हरि ॥
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Very nice….👌👌👏👏👍
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Well explained!
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What a great article
First time, I am seeing someone explaining about responsibilities of a man towards his wife.
Please keep up the good work
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