प्राचीन कलिकाल में काकभुशुण्डि जी ने अयोध्या में मानव जन्म लिया । उस जन्म में उनकी भगवान शिव में तो अत्यंत श्रद्धा थी पर वे दूसरे देवताओं की निंदा करते थे । तब एक अत्यंत ज्ञानी व सहज हृदय ब्राह्मण ने उन्हें कई बार समझाया और भगवान शिव की भक्ति का ज्ञान भी दिया । काकभुशुण्डि जी को भगवान शिव की भक्ति सम्बन्धी बातें तो बहुत पसंद आती पर अन्य देवताओं की प्रशंसा सुनकर वे अत्यंत क्रोधी हो जाते थे ।
समय के साथ उन के अंदर अपने ज्ञान का दंभ बड़ने लगा । एक बार वो शिव मंदिर मे शिव पूजा कर रहे थे, तभी वह ब्राह्मण देवता मंदिर में आए । काकभुशुण्डि जी ने उन्हें देखा पर ना ही वो अपने आसान से उठे और ना ही उन्हें प्रणाम किया ।
यह देख भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और आकाशवाणी की माध्यम से उन्होंने काकभुशुण्डि जी को तुरंत सर्प योनि का तथा १००० जन्मों तक विभिन्न योनियों में भटकने का श्राप दे दिया ।श्राप सुनकर काकभुशुण्डि जी क़ापने लगे ।
तब ब्राह्मण देव ने काकभुशुण्डि जी पर दया भाव के साथ उनके उद्धार के लिए भगवान शिव की स्तुति प्रारम्भ की । रामचरितमानस के उत्तर कांड में वर्णित यह स्तुति अत्यंत करुणा से भरी हुई है । इस स्तुति के श्रद्धा पूर्वक पाठ से भगवान शिव तुरंत ही द्रवित हो जाते है और अति दुर्गम कष्टों का भी निवारण कर देते है
तो आइए हम इस अदभुत स्तुति का पाठ करते है – गायन करते है

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥
प्रेम सहित दण्डवत् करके वे ब्राह्मण श्री शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदगद वाणी से विनती करने लगे-॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥1॥
हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात् मायादिरहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ॥1॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥3॥
जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है॥3॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ॥4॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ॥5॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानंदघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥
जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले हे प्रभो! प्रसन्न होइए॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
जरा जन्म दुःखोद्य तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥8॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
भगवान् रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं ॥

ब्राह्मण देव द्वारा की गई विनम्र स्तुति से भगवान शिव तुरंत ही प्रसन्न हो गए । तब ब्राह्मण देव से उनके चरणों में अविरल भक्ति का वरदान माँगा तथा जी के श्राप की अवधि को कम करने के लिए याचना की ।
अब चूँकि भगवान का श्राप मिथ्या तो नहीं हो सकता था । पर भगवान शिव ने कहा कि काकभुशुण्डि जी को जन्म तथा मृत्यु के समय, अर्थात् अपनी पुरानी देह त्याग कर नई देह धारण करते वक्त, होने वाली भयंकर पीड़ा का अनुभव नहीं होगा और इनका उस जन्म में अर्जित ज्ञान भी कभी नष्ट नहीं होगा
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥
सर्वज्ञ शिवजी ने विनती सुनी और ब्राह्मण का प्रेम देखा। तब मंदिर में आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो॥
जौं प्रसन्न प्रभो मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥
(ब्राह्मण ने कहा-) हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिए॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान॥
हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी माया के वश होकर निरंतर भूला फिरता है। हे कृपा के समुद्र भगवान्! उस पर क्रोध न कीजिए॥
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥
हे दीनों पर दया करने वाले (कल्याणकारी) शंकर! अब इस पर कृपालु होइए (कृपा कीजिए), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समय में इस पर शाप के बाद अनुग्रह (शाप से मुक्ति) हो जाए॥
कल्याणम अस्तु ॥
In his previous birth, Kakabhusundi ji had great reverence for Lord Shiva but he used to condemn other gods. Then a very knowledgeable and simple hearted Brahmin explained him many times and also gave knowledge of devotion to Lord Shiva. But, Kakabhusundi ji didn’t like it and still used to get very angry after hearing the praise of other gods.
With time, he became more arrogant. Once he was worshiping Shiva in the temple, same Brahmin came to worship the deity but Kakbhusundi neither got up nor did he pay any respect to him. Seeing this, Lord Shiva became very angry and through Akashvani, he immediately cursed Kakabhusundi to wander into the serpent’s form and other vagaries for 1000 births. Hearing the curse, Brahmin Dev felt very sad from him. He started praising Lord Shiva for Kakbhusundi’s salvation with compassion.
This eulogy, described in the Uttar-Kand of Ramcharitmanas, is full of compassion. With the reverential recitation of this eulogy, Lord Shiva gets pleased immediately and removes the most insurmountable sufferings.
#NamamiShamishann
#ShivRudrashtakam
#JaiShreeRam
#RamayanChaupai
#ShriBharatSharnam


Ati Uttam
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aapka yah kam bahut acha hai
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Very emotional and heart touching prayer
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Om Namah Shivai
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vry nice…👍👌👌👏👏
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Very good religious knowledge which is rarely seen among current generations.
It is insightful and eye opening
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